Wednesday, November 25, 2009
लोकमंगल ऐसे मुद्दे उठाता है यह बेहद ज़रूरी काम है।
० मार्फत राजमणि जी कनाडावासी समीर लाल समीर की कविता की ये पंक्तियां मजेदार लगीं-
जब मौसम की घुमड़ाई से
बादल भी पसरे जाते हैं
जब मौसम ठंडा होता है
या मुझको गर्मी लगती है
जब बारिश की ठंडी बूंदें
कुछ गीली गीली लगती हैं
तब ऐसे में बेबस होकर
मैं किसी तरह जी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.
० भाई अनिल ने बाबरी मस्जिद के प्रपंच को खूब बढ़िया ढंग से खेंचा है। राजनीति की ये बेशर्म नौटंकी आखिर कब खत्म होगी।
लोकमंगल ऐसे मुद्दे उठाता है यह बेहद ज़रूरी काम है। आप सभी को मेरा सलाम है।
ओ.चांडाल
मेरी याद आये तो याद करो
मेरी याद आये तो याद करो
ज्यादा याद आये तो एस एम् एस करो
और ज्यादा याद आये तो फ़ोन करो
और भी ज्यादा याद आये तो मिल लो
और ज्यादा याद आये तो ..
प्लीज़ झूठ बोलना बंद करो
आपकी नज़रों ने हमें घायल कर दिया,
तुम्हारे एक इशारे ने हाल – इ – दिल बयां कर दिया .
यादों ने तुम्हारी हमें पागल बना दिया ,
रोये थे न कभी पर आपने रुला दिया ?
नज़रें न होती तो नज़ारा न होता ,
दुनिया मैं हसीनो का गुज़ारा न होता ,
हमसे यह मत कहो के दिल लगाना छोड़ दे ,
जाके खुदा से कहो के हसीनो को बनाना छोड़ दे
Pravin singh
तुम्हारी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे ?
छः दिसम्बर १९९२ के बाद कितनी ही बार संध, बीजेपी और शिवसेना के नेताओं ने वोट बटोरने के लिए बाबरी विध्वंस पर अपने भड़काऊ बयान दिए थे। आश्चर्य है कि फिर भी इस घटना की जांच में लिब्राहन आयोग को इतने साल लग गए। एक घटना जो पूरी दुनिया के सामने घटी, हजारों लोगों और मीडिया की उपस्थति में जिसे अंजाम दिया गया, उसकी जाँच में इतना वक्त लगा? जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा बेदर्दी से फूँका गया सो अलग। सवाल उठता है आख़िर इस सारे प्रकरण से आम आदमी को हासिल क्या हुआ? उसका कोई फायदा हुआ, इस देश की किसी समस्या का कोई हल हुआ?
जब 'बाबरी' थी और अब, जब बाबरी नही है, क्या आम आदमी को इससे कोई फर्क पड़ा ? 'मन्दिर' बनाने के कितने ही दावे किए गए । कहा गया सत्ता में आए तो ' मन्दिर वहीं बनेगा' , सत्ता मिल भी गई, फिर भी मन्दिर नहीं बना। मन्दिर बनने - न बनने से किसी को कोई फर्क पड़ा? लेकिन जनता ये समझ गई कि सत्ता की बिसात पर शह और मात के खेल में उसे एक मोहरा बना कर, धर्म के नाम पर उसकी भावनाएं भड़का कर इस्तेमाल किया गया । ऐसे नेता कुछ समय तक सत्ता का सुख उठाने में भले ही कामयाब हो गए हों लेकिन आज वो एक हाशिये पर पड़े हैं। ये इस बात का उदाहरण है कि जनता को जो लोग बेवकूफ समझने की गलती करते हैं , जनता उन्हें कैसे सबक सिखाती है।
जहाँ तक तत्कालीन कांग्रेस सरकार का सवाल है, उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्य मंत्री कल्याण सिंह जब कोर्ट में हलफनामा देकर राज्य की कानून यवस्था बनाये रखने और बाबरी की हिफाज़त करने की बात कह चुके थे तो नरसिंह राव सरकार किस आधार पर उत्तर प्रदेश में हस्तक्षेप करती। कल्याण सिंह ने भी केन्द्र से कोई मदद नहीं मांगी थी।
आयोग की रिपोर्ट में जिन नेताओं के नाम हैं, उन पर कोई कार्रवाई होगी, सोचना बेकार है। जब जांच में ही सत्रह साल लग गए तो अपने यहाँ की न्याय व्यवस्था में मुक़दमे चलने, सज़ा मिलने में तो चौथाई सदी ही बीत जाएगी।
बहरहाल, ये वो पहाड़ था जिसके खोदने पर मरा हुआ चूहा ही निकलेगा, सबको पता था , फिर भी खुदाई की गई।
अनिल २५.११.२००९ (४.१५ सायं)
सड़क के साथ छेड़छाड़
ट्रेफिक समस्या को लेकर आपने हजामत में कमाल कर दिखाया है। सच में दिल्ली में इन दिनों जाम की समस्या बड़ी बेकाबू हो चुकी है। खासकर धार्मिक जलूसों और राजनैतिक पार्टियों के कारण। आप की टिप्पणी से में पूरी तरह सहमत हूं। हमें सोचना चाहिए कि जाम को दौरान एक्सीडेंट केस और पेशेंट्स का क्या हाल हो सकता है। सड़के हमारी ज़रूरत हैं अय्याशी का अड्डा नहीं। और न ही पिकनिक स्पॉट। ऐसे लोगों को कड़े-से-कड़ा दंड मिलना चाहिए जो सड़क के साथ छेड़छाड़ करते हैं।
मधु चतुर्वेदी
Tuesday, November 24, 2009
बस ऐसे में पी लेता हूँ.

ब्लाग उड़न तश्तरी वाले कनाडा निवासी भाई समीर लाल ’समीर’ कहना है –
हाँ, तो हम कह रहे थे कि हमें पीना यूँ तो पसंद नहीं मगर जब मजबूरी आन सामने ही खड़ी हो जाये तो क्या करें?? इन्हीं मजबूरियों को दर्शाते हुए एक रचना लिखी है ताकि किसी को कन्फ्यूजन न रह जाये, सनद रहे और वक्त पर काम आये:
या तारे नभ में छाते हैं
जब मौसम की घुमड़ाई से
बादल भी पसरे जाते हैं
जब मौसम ठंडा होता है
या मुझको गर्मी लगती है
जब बारिश की ठंडी बूंदें
कुछ गीली गीली लगती हैं
तब ऐसे में बेबस होकर
मैं किसी तरह जी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.
जब मिलन कोई अनोखा हो
या प्यार में मुझको धोखा हो
जब सन्नाटे का राज यहाँ
और कुत्ता कोई भौंका हो
जब साथ सखा कुछ मिल जायें
या एकाकी मन घबराये
जब उत्सव कोई मनता हो
या मातम कहीं भी छा जाये
तब ऐसे में मैं द्रवित हुआ
रो रो कर सिसिकी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.
जब शोर गुल से सर फटता
या काटे समय नहीं कटता
जब मेरी कविता को सुनकर
खूब दाद उठाता हो श्रोता
जब भाव निकल कर आते हैं
और गीतों में ढल जाते हैं
जब उनकी धुन में बजने से
ये साज सभी घबराते हैं
तब ऐसे में मैं शरमा कर
बस होठों को सी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ.
जब पंछी सारे सोते हैं
या उल्लू बाग में रोते हैं
जब फूलों की खूशबू वाले
ये हवा के झोंके होते हैं
जब बिजली गुल हो जाती है
और नींद नहीं आ पाती है
जब दूर देश की कुछ यादें
इस दिल में घर कर जाती हैं
तब ऐसे में मैं क्या करता
रख लम्बी चुप्पी लेता हूँ
वैसे तो मुझको पसंद नहीं
बस ऐसे में पी लेता हूँ।
अपने सामने भी तो एक आईना होता है
मिलता वही है जो किस्मत में लिखा होता है
हर चीज़ मिले हमें यह ज़रूरी तो नही
कुछ चीज़ों का जिक्र दूसरे जहाँ में होता है
जो ख़ुद को कोसते हैं वो शायद बेखबर हैं
कुछ पा लेने का इख़्तियार ख़ुद पे भी होता है
हर एक को कसूरवार क्यूँ ठहराएं हम
अपने सामने भी तो एक आईना होता है
हम अपनी ज़िन्दगी से क्यूँ हार जायें
अगर डूबता है सूरज तो कल भी उजाला होता है
प्रस्तुति : अनिल २४.११.२००९ (५.१५ सायं)
मुनीन्द्र नाथ
फाक्स से हनीमून
मुनीन्द्र नाथ
मैं अभी अधर में हूं मैं अभी अधर में हूं
आप कहां हैं। लगता है बहुत ज्यादा व्यस्त हैं। आज मुनीन्द्रजी ने एसएमएस के जरिए निमंत्रण पत्र की बात की उससे मुझे कोई हैरत नहीं हुई कुछ दिन बाद तो हनीमून भी फैक्स से हो जाया करेगी ऐसा मेरा मानना है। प्रदीप शुक्लाजी ने देश को बांटने और जनता को पशुओं की रती हांकनेवाले नेताओं पर जो व्यंग्य किया है वह विचाऱणीय है। आदरणीय विपिनजी ने अपनी एक पोस्ट के बारे में स्पष्टीकरण दिया है,यह इनकी रचनागत ईमानदारी का सबूत है। वरना आजकल तो लोग खूब बेशर्मी से दूसरों की कविता अपने नाम से पढ़कर खूब वाहवाही लूट लेते हैं। प्रदीप शुक्ला की पुस्तकों पर बातचीत और अनिल गुप्ता की पोस्ट जानदार है। मैं अभी अधर में हूं मतलब न तो कार्यालय में हूं और न घर पर फिरभी ब्लॉग लिख रहा हूं। हंसजी की कविता भी खूब मज़ा दे रही है। ऐसे ही लिखते रहें। मैं कल घर पहुंचकर तफ्सील से कुछ लिखूंगा। जय लोक मंगल..
पं. सुरेश नीरव
Monday, November 23, 2009
आपने मेरे शब्दों पर प्रशंसा जताई
और एक कम खर्चे की बात बताई
प्रदीप शुक्लाजी मैं व्यस्त न भाई
एक शादी की नींद बहुत सताई
आज फिर मैंने अपनी कलम उठाई -
मन के कागज पर लिखतीं ,
साँसें मेरी कलम बनकर ।
ह्रदय पटल पर छप जाती हैं ,
भावों की स्याही भरकर।
सौंधी सौंधी गंध सुगंध में ,
रस सौरभता पातीं वो ।
इंद्र धनुष- सी चमक गगन में ,
गीत मिलन का गातीं वो।
वासन्ती मेला में खेलें ,
सरसों-सी उमंग भरकर।
मन के कागज़ पर लिखतीं,
सांसें मेरी कलम बनकर ।।
भगवानसिंह हंस
चल कबीर घर आपने
मुनीन्द्र नाथ
आशा है आप इंदौर यात्रा से वापिस आगये होंगे। बहुत विनम्रतापूर्वक यह स्पष्ट करना चाहता हूँ की ग्वालियर के बारे में कही पंक्तियाँ मेरी नहीं हैं। सिंधिया काल में जयाजी प्रताप नामक एक सरकारी साप्ताहिक निकलता था, जो बाद में मध्य भारत संदेश होगया था। उसके संपादक थे श्री रामकिशोर शर्मा किशोर । बहुत करके यह उन्हीं की रचना है। इस कविता का पाठ करके स्कूल में बहुत बार पुरस्कार जीते हैं और आज भी जबभी, जहाँ भी हम ग्वालियर के डॉक्टर मिलते हैं तो इसका पाठ करते हैं । यह रचना मेरी न मानी जाए, इसलिए यह स्पष्टीकरण दे रहा हूँ॥
विपिन चतुर्वेदी.
धन्यवाद !
अनिल २३.११.२००९ (५.४५ सायं )
छाज तो बोले, छलनी भी बोले...
अनिल २३.११.२००९ (५.३० सायं )
आज कहां हैं...
अनिल जी आज आप लोक मंगल से कहीं गायब हैं क्या हुआ, कुछ आपका रचनात्मक कौशल आज नहीं दीख रहा ।
नीरवजी आज आपकी अनुपस्थिति, खासकर ब्लाग पर, खल रही है ।
हंस जी कुछ लगता है कहीं व्यस्त हैं ।
प्रदीप शुक्ला
बधाई ही बधाई...
तू ने फिर याद किया हो जैसे।
मकबूल जी द्वारा पेश पंक्तियां बहुत ही अच्छी लगीं । खासकर उपरोक्त पंक्तियां तो बहुत ही अच्छी हैं। उन्हें बहुत बधाई। जानकारी मिली कि उनकी सुपुत्री का विवाह है । उनको मेरी ओर से और बहुत-बहुत बधाई ।
प्रदीप शुक्ला
क्या राजनेता.....।
आज के जमाने में धर्म और राज्य के आधार पर देश को बाँटने की कोई आवश्यकता नहीं रह गयी है । देश को सूबों में बाँटकर राजकाज को आसान बनाने की आवश्यकता मध्ययुग में थी । आज जब पल भर में सूचना विश्व के कोने कोने में पहुँच रही है तब राज्य किसलिए ? इसी तरह यदि हमारा देश वास्तव में धर्म निरपेक्ष है तो देश का हर नागरिक धर्म और जाति से ऊपर उठकर देखा जाना चाहिए । अब जब एक तरफ हर नागरिक को अलग पहचान नम्बर देने की बात की जा रही है और सबकी आर्थिक स्थिति का रिकॉर्ड रख पाना भी कोई मुश्किल कार्य नहीं रह गया लगता है । ऐसे में जाति को आधार बनाकर सब लोगों को गाय-भैंस की तरह हाँकने से क्या फायदा ?
मुद्दा है कि क्या हमारे राजनेता देश को वाकई आगे ले जाना चाहते हैं ?
हो सके तो अपनी राय इस मुद्दे पर भी जाहिर कर सकते हैं।
प्रदीप शुक्ला
जीवन्तता बनायें रखें
शब्द शिल्पी कहूँ या शब्द मनीषी
आपने जो रचना रची, अनुपम ही रची
ह्रदयस्पर्शी और बेहतरीन ग़ज़ल के लिए मेरी बधाई।
अरविन्द चतुर्वेदी जी से अनुरोध है '' नंगे से पर्वत दिखे, हरयाली ना दूब,लिपट लिपट कर पेड़ से रोया बादल खूब" की पूरी रचना पोस्ट करने की कृपा करें।
डॉक्टर मधु चतुर्वेदी जी से भी गुजारिश है कि वे अपनी रचनाओं से अवगत कराएँ। वैसे आपका अंदाज़ा सही है मैं पत्रकारिता के क्षेत्र से ही हूँ।
भाई मकबूल जी को बेटी के विवाह के शुभ अवसर पर बधाई और ढेरों शुभकामनायें।
प्रदीप जी का ' हमारी धरा और हम' की ये पंक्तियाँ यदि पृथ्वी में स्वत: शांति है तो यह झंझावात, चक्रवात, सुनामी आदि अशांति के परिचायक क्यों मनुष्य को दुख देते रहते हैं। इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य़ को अपने की कर्मों में ढूंढना चाहिए इस धरा के वर्तमान संकट के मूल की ओर स्पष्ट संकेत करती हैं। विचारोतेजक लेख के लिए उन्हें बधाई।
उनके द्वारा प्रस्तुत राहुल उपाध्याय की कविता सुंदर है। भला छाते ही बादल कहीं बरखा भी होती है?होने-बरसने में यारो इक उम्र गुज़रती है , जीवन की तल्ख़ सच्चाइयों का प्रतिबिम्ब पेश करती है। लीक से हटकर कुछ देने के लिए उनका धन्यवाद।
साथियों से अनुरोध है वे इसी तरह ब्लॉग की जीवन्तता बनायें रखें।
अनिल २३.११.२००९ ( ३.४५ सायं )
Sunday, November 22, 2009
नई किताबें

दो नई किताबें 1.
किताब- जिस की झोली में है प्यार
लेखक- कमलेश भारतीय
प्रकाशक- अमन प्रकाशन, हिसार
मूल्य-50 रुपये ।
दादा जे. पी. वासवानी के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधारित है यह किताब । इसमें दादा के व्यक्तित्व व जीवन, संत परंपरा को गे बढ़ाता है जिसमें संतोष, प्रेम, अध्यात्म आदि भाव, भक्ति में सहायक हैं ।
2.
किताब- आप बीती जग बीती
लेखक- शिवशंकर गोयल
प्रकाशक-डायमंड बुक्स, नई दिल्ली
मूल्य-95 रुपयेइस संग्रह में लेखक ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों की न सच्चायों से रू-ब-रू कराया है, जो किसी की बी आपबीती जैसे हैं । भ्रष्टाचार, राजनीतिक अवस्था और अध्यात्म के पाखंड जैसे विषयों पर लेखक के तीखे व्यंग्य पठनीय हैं । ये केवल व्यंग्य मात्र ही हों, एसा नहीं है बल्कि सच को भी अपने इसी ढंग से उजागर करने में भी लेखक को सफलता प्राप्त हुई है ।
प्रदीप शुक्ला
फूलों की बगिया ज्यों किश्तों में खिलती है
इंसां की किस्मत भी किश्तों में जगती है
भला छाते ही बादल कहीं बरखा भी होती है?
होने-बरसने में यारो इक उम्र गुज़रती है
मिलना-बिछड़ना, व हँसना व रोना
इन के ही मिश्रण से शख़्सियत निखरती है
जब आता है संकट, हम खुद को परखते हैं
और मूल्यों-विश्वासों की दुनिया सँवरती है
जब होता है मन का, तो लगता है अच्छा
जब मन का न हो, तभी तो मणियाँ निकलती हैं
प्रस्तुति-प्रदीप शुक्ला
मध्य प्रदेश की यात्रा पर
पालागन
आज दिनांक २२-११-२००९ पंचवी को मध्य प्रदेश की धरती पर देवी अहिल्याबाई की पुन्य भूमि में विश्वविख्यात ,शब्द मनीषी महान कवि श्री नीरवजी के पावन चरण पड़े। इंदौर की धरती ऐसे यशस्वी कवि को पाकर धन्य हो गई।
भगवानसिंह हंस
शब्द
क्यों हो नि:शब्द
बोलो , कुछ तो बोलो
अधरों को खोलो
यदि तुम हो जाओगे मौन
तो बोलेगा कौन
बोलो, कुछ तो बोलो
मुझे अपना बना लो
या फिर मेरे होलो
मेरी वाणी में रस अपना घोलो
बोलो, मेरे शब्द ,कुछ तो बोलो
क्या तुम छोटे हो \मुखौटे हो
जो बोल नहीं रहे
क्यों मुझसे रुंठे हो
शब्द बोला
मैं चला तुम से दूर
क्योंकि तुम झूंठे हो ।
भगवानसिंह हंस
भगवानसिंह हंस
हमारी धरा और हम

भाईयो पिछले कुछ समय से नई किताबें, उनकी जानकारी अभी नहीं दे पाया, जल्दी ही कुछ किताबों की जानकारी दूंगा। इंतजार । तब तक आइए जरा यह भी विचार करें ।
आज की इस भौतिकवादी दौड़ में हम प्रकृति से कैसा खिलवाड़ कर रहे हैं और अंत में अपनो और आनेवाली पीढ़ी के लिए क्या विरासत में दे रहे हैं, आइए सोचें-
हमारी धरा ने हम सब को धारण किया हुआ है किंतु हम मनुष्य कोई न कोई उत्पात ऐसा मचाते रहते हैं कि धरा जैसी धैर्यशाली माता भी अपने संतानो से ऊब जाए और कहे अब बहुत हो चुका है। कहीं पृथ्वी का खनन करते हैं तो कहीं जंगल के जंगल काट डालते हैं, पहाड़ो में सुरंगो का जाल बिछा देते हैं और नदियों के प्रवाह को बांध बना कर उन्हे रोक देते हैं। माना कि मनुष्य अपनी प्रगति के लिए और कम ज़मीन पर अधिक अन्न उपजाने के लिए तथा बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए सर पर छत बनाने के उद्देश्य से ही धरती में फेर बदल करते रहते हैं। किंतु जब यह फेर बदल लक्ष्मण रेखा लाँघ जाता है तो मौसम बदलने लगता है। और मौसम इस कदर बदलता है कि कभी अतिवृष्टि तो कभी अनावृष्टि, कभी मॉनसून के मौसम में बादलो का आकाश में न आना तो कभी असमय में ही घनघोर वर्षा हो जाना हमारे अपने ही कुकृत्यों और कुकर्मो का परिणाम है। यदि प्रकृति और जीवात्मा में आपसी तालमेल रहे तो सृष्टि में शांति रहती है। हमारे कार्यो में और आपसी तालमेल में संतुलन अत्यंत आवश्यक है। जब मनुष्य लोभ और लालच के चक्रव्यूह में फंस जाता है तो उसे उन बुराइयों से छुटकारा पाने और व्यूह से बाहर निकलने का मार्ग नहीं सूझता। वो अफनाता रहता है और मन की शांति तथा तन के स्वास्थ्य से वंचित हो जाता है।
परमपिता परमात्मा नें मनुष्य मात्र के मार्ग दर्शन के लिए वेद मंत्र ऋषियो के हृदय में प्रकाशित किया और उन्ही मंत्रो के बीच शांति तथा मनुष्य और पर्यावरण में अर्थात जीव जंतुओं तथा प्रकृति के बीच सामंजस्य के लिए हमें मार्ग दिखाया।
शांति के लिए वेद मंत्र
औ3म् द्यौ: शांतिरन्तरिक्षँ शांति: पृथ्वी शांतिराप:
शांतिरोषधय: शांति:। वनस्पतय: शांतिर्विश्वे देवा:
शांतिर्ब्रह्म शांति: सर्वँ शांति: शांतिरेव शांति: सा मा
शांतिरेधि। ओ3म् शांति: शांति: शांति: ।।
इस ब्रह्मांड में अनेक ग्रह और नक्षत्र हैं जिनमें हमारी पृथ्वी भी एक ग्रह है। हमारे सौरमंडल में मानव जीवन संभवत: पृथ्वी पर ही है। परमात्मा द्वारा निर्देशित मार्ग पर चलते हुए जीवात्मा प्रकृति से भी शांति पाता है। अपनी पुस्तक वेद प्रवचन में पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय ने लिखा है कि द्यौ लोक, अंतरिक्ष में, पृथ्वी पर, औषधियों में, वनस्पतियों में जो शांति स्वत: विराजमान है उसी शांति की कामना हम मनुष्य करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वो शांति हमें भी मिले। प्रश्न यह उठता है कि यदि पृथ्वी में स्वत: शांति है तो यह झंझावात, चक्रवात, सुनामी आदि अशांति के परिचायक क्यों मनुष्य को दुख देते रहते हैं। इस प्रश्न का उत्तर मनुष्य़ को अपने की कर्मों में ढूंढना चाहिए। जब हम धरती से अनावश्यक छेड़ छाड़ करते हैं तो आपात कालीन स्थिति को स्वंय निमंत्रण देते हैं।
इस समय हमारे पृथ्वी लोक में गर्माहट आवश्यकता से अधिक बढ़ रही है। फलस्वरूप उत्तरी ध्रुव तथा दक्षिणी ध्रुव में हिम खंड पिघल कर टूटते हुए विशाल बर्फ के पहाड़ो से अलग हो रहे हैं तथा जल के रूप में धारा बन कर के पृथ्वी के अनेक भागों में प्रवाहित हो रहे हैं। ध्रुव से चल कर आइए हम भारत पहुंचते हैं। गंगा के स्रोत गंगोत्री और उससे भी ऊपर गोमुख में तथा आस पास विशाल हिम का भंडार अब नहीं है। भूगर्भशास्त्रियों का यह कहना है कि गंगोत्री और गोमुख दोनो ही स्थान अब अपने मूल स्रोत से पीछे की ओर जा रहे हैं। धीरे धीरे विशाल नदी गंगा सिमट कर पतली जल रेखा समान न हो जाए, इसके लिए हमें अभी से प्रयास करके वातावरण में अनावश्यक गर्माहट को कम करना है।
भौगोलिक स्तर पर सभी देशो को विशेष कर विकसित देशो को, विशेष रुप से अनावश्यक वातावरण की गर्माहट को कम करने का प्रयास करना होगा। उदाहरण के लिए चीन में ऊर्जा का सत्तर प्रतिशत स्रोत कोयला है। कोयले से उत्पन्न गर्माहट और धुआँ वातावरण में जितना प्रदूषण फैलाता है उतना ऊर्जा का कोई अन्य स्रोत नहीं करता। संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में पिछले कई वर्षों से कभी जापान में तो कभी दक्षिण अमेरीका में सम्मेलन होते रहे हैं किंतु वह विद्यार्थियों के वाद-विवाद प्रतियोगिता के स्तर से कभी ऊपर नहीं उठ पाए। अभी दिसंबर 2009 में कोपेनहेगन में एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन होगा जो हमारी पृथ्वी के वातावरण में अनावश्यक गर्माहट को कम करने पर विचार करेगा। सफलता मिलेगी या नही इसमें संदेह है। अंत में हमे इस चेतावनी पर अवश्य ध्यान देना चाहिए कि यदि भौगोलिक गर्माहट इस द्रुत गति से बढ़ती रही तो अगले कुछ दशकों में संभवत: मॉलदीव, मुंबई और लंदन के कुछ भागो का पृथ्वी से लोप हो जाएगा। धरा के कई भागो का समुद्र में समा जाना, मनुष्य को खेती आदि के लिए कम धरती मिलने का कारण बनेगा। इससे सामाजिक तनाव बढ़ेगा और अतंरराष्ट्रीय तनाव मानव को युद्ध की विभिषिका में ढकेल देगा।
हवन है रामबाण
पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिए और भौगोलिक गर्माहट को कम करने के लिए जो उपाय हमारे सीमित साधनो से हो सकते हैं, उनमें हवन प्रमुख है। यदि बड़ी संख्या में नगर नगर में गाँव गाँव में नागरिक हवन करते रहें तो पर्यावरण प्रदूषण से मुक्ति पाने में मदद मिल सकेगी। साथ ही साथ हमें ऐसे उपकरणों का उपयोग नही करना चाहिए जो गर्माहट को बढ़ाते हैं। एक सामान्य सी बात यह है कि पीला प्रकाश देने वाला बल्ब गर्माहट को बढ़ाता है जबकि सी एफ एल जैसे प्रकाश स्रोत गर्माहट को कम बढ़ाते हैं तथा ऊर्जा की खपत भी कम होती है।
जब ऊर्जा की खपत कम होगी तो ऊर्जा उत्पादन के साधनो से जो भौगोलिक गर्माहट बढ़ती जा रही है उसमें निश्चित रूप से कमी आएगी। ध्रुव के हिम खंड नही टूटेंगे और गोमुख गंगोत्री यथा स्थान बने रहेंगे।
आइए, हम और आप मिल करके वेद मंत्रो के उच्चारण के साथ हवन करते रहे तथा पड़ोसियों को और भूमंडल के अन्य देशों के नर-नारियों को हवन करने की प्रेरणा देते रहें। इसी से हम अपने वैदिक उद्देश्य, सर्वे भवंतु सुखिन: को प्राप्त करनें में सफल होंगे, निरोग रहेंगे और सुखमय तथा शांतिमय जीवन व्यतीत करेंगे।
सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया: ।
सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत् ।।
प्रदीप शुक्ला
लोक मंगल पर बहार आई है
मेरी बेटी की शादी २७ नवम्बर को है। लिहाज़ा बेहद व्यस्त हूँ। समय मिलते ही ब्लॉग पर हाजिरी ज़रूर दूंगा। मेरी अनुपस्थिति अगर हो तो वजह मैं ने बता दी। आज एहसान दानिश की एक ग़ज़ल पेश है।
यूँ न मिल मुझसे ख़फा हो जैसे
साथ चल मौजे- सबा हो जैसे।
लोग यूँ देख कर हंस देते हैं
तू मुझे भूल गया हो जैसे।
इश्क को शिर्क की हद तक न बढ़ा
यूँ न मिल मुझ से खुदा हो जैसे।
मौत भी आई तो इस नाज़ के साथ
मुझपे एहसान किया हो जैसे।
ऐसे अनजान बने बैठे हो
तुम को कुछ भी न पता हो जैसे।
हिचकियाँ रात को आती ही रहीं
तू ने फिर याद किया हो जैसे।
ज़िन्दगी बीत रही है दानिश
एक बेजुर्म सज़ा हो जैसे।
मृगेन्द्र मकबूल
Saturday, November 21, 2009
आज रविवार और छुट्टी का दिन
इस लोक्मंगला मंच मैं भी सभी विभिन्न क्षेत्रो से अपना सम्बन्ध रखने वाले महानुभाव समाज की प्रति समपर्ति है। इस मंच की दिन दोनी रत चोगुनी प्रगति होत राहे।
मुनीन्द्र नाथ
।
अशोक मनोरम
शारदा पाठक का अभी-अभी निधन हो गया
अरविंद पथिक
नीरवजी आपकी गजल ने बहुत सुख दिया।

आज ब्लॉग पर नीरवजी आपकी गजल ने बहुत सुख दिया। कई दिनों बाद आप की ग़ज़ल पढ़ने को मिली। हर शेर बेहतरीन है। और काफी गहराई लिए हुए है। इतने बेहतरीन शेर तभी आते हैं जब आदमी गहरे दर्द से गुज़रता है। राजमणिजी ने महेश अनघ की अच्छी ग़ज़ल दी है और मकबूलजी ने तो गजब ढाया हुआ है। इस बीच अनिल जी के पोस्ट पढ़कर लग रहा है कि बंदा कोई पुराना पत्रकार है,क्योंकि भाषा की कसावट यह बता रही है की ये कोई अनुभवसंपन्न व्यक्ति हैं-अनिलजी। प्रदीप शुक्लाजी ने नई किताबों की चर्चा बहुत दिन से नहीं की है,उन्हें अपना सिलसिला जारी रखना चाहिए। अशोक मनोरम ने क्या इसके बाद और कोई कविता ही नहीं लिखी जो उसे ही आपने दुबारा पोस्ट कर दिया है। हंसजी ने कविता आप पर लिखी है यह उनका आपके प्रति सम्मान भाव है। आज के दौर में कौन किसका कितना सम्मान करता है इसीसे आदमी का संस्कार पता चल जाता है।
आप इंदौर जा रहे हैं मेरी शुभकामनाएं...
डॉ। मधु चतुर्वेदी
गज़ल : सभी गलों से इसके ही स्वर गूंजेंगे कल से
एक उखड़े पेड़ ने कितना रुलाया है मुझे"
यूं तो पूरी की पूरी गज़ल लाजवाब रही पर प.सुरेश नीरव की उम्दा गज़ल का उपर्युक्त शेर पढ़कर मुझे अपना एक दोहा याद आ गया. पेशे-खिदमत है:
" नंगे से पर्वत दिखे, हरयाली ना दूब,
लिपट लिपट कर पेड़ से रोया बादल खूब".
अपने ब्लोग भारतीयम पर आज शाम एक गज़ल पेश की थी , साथियों की फरमाइश पर लोक मंगल के लिये विशेष तौर् पर पेश है :
दीवारों से टकराने का अभ्यास ज़रूरी है
पत्थर को पिघलाने का प्रयास ज़रूरी है.
धार नदी की मुड़ सकती है, बस दो हाथों से
अपने हाथों पर ऐसा विश्वास ज़रूरी है.
तृप्त नहीं होती जो मंज़िल को पा जाने तक़
मंज़िल के हर राही को वह प्यास ज़रूरी है.
बीच सफर से जो मुड़ जाये वापस जाने को
ऐसे सारे लोगों का उपहास ज़रूरी है.
मार कुंडली जो बैठे सम्पूर्ण व्यवस्था पर
ऐसे काले सर्पों का सन्यास ज़रूरी है.
हारे थके बदन में फिर से जोश जगाने को,
थोड़े आंसू, कुछ कुंठा ,संत्रास ज़रूरी है.
बहुत अकेले से लगते हैं ये टेढ़े रस्ते ,
एक जीवन साथी का होना पास ज़रूरी है.
सभी गलों से इसके ही स्वर गूंजेंगे कल से
गज़ल लिखे जाने तक़ ये अहसास ज़रूरी है.
ये तो हद हो गई....
उधर अशोक चव्हाण की मति मारी गई है। आई बी एन के दोषियों पर कार्रवाई करने से रहे और राज के आगे नतमस्तक हो गए। क्यों भाई , रेलवे में मराठियों को ज्यादा नौकरियां क्यो दी जायें। देश में दूसरे काबिल लोग नहीं है क्या। यहाँ हम मराठी भाषा या मराठियों का विरोध नहीं कर रहे। हम सब एक ही देश के वासी हैं और सबको संविधान ने अपनी रोज़ी-रोटी कमाने का बराबर आधिकार दिया है। तो राज कौन होते हैं इसमे दखल देने वाले और ये हक इनको दिया किसने। आश्चर्य है एक सिरफिरे के आगे सब बेबस हो रहें हैं।
राज को ये भ्रम हो गया है कि वो देश के सबसे ताकतवर इन्सान हो गए हैं। रेलवे के एग्जाम्स में उत्तर भारतीयों की पिटाई करने के बाद भी उनका कुछ नहीं बिगड़ा। कोई बताये मुंबई में कानून का शासन है क्या।
राज को क्यों इतना चढाया जा रहा है। शायद कांग्रेस राज के जरिये बीजेपी -शिवसेना के वोट बैंक में सेंध लगना चाहती है। लेकिन कोंग्रेस को ये खेल भारी पड़ेगा। मुंबई की आग दूसरे राज्यों में भी फ़ैल सकती है। तब राज क्या करेंगे। ....और उसका जिम्मेदार कौन होगा।
अनिल (२१ नवम्बर २००९) सायं ५.२५
कितने जंगल कत्ल होंगे इक सड़क के वास्ते
कई दिनों के बाद...
इधर काफी कुछ निरंतर और अच्चे से अच्छा देखने पढ़ने को मिला ।
0 पं. नीरवजी को बधाई, उन्होंने हजामत के तहत कई बड़े-बड़ों की हजामत बना डाली ।
0 भाई अनिल ने आज की जो टिप्पणी ठाकरे पर दी, वह बहुत ही अच्ची है, उन्हें बहुत बधाई, इसी तरह वे और लगातार डटे रहेंगे तथा और साथियों जो इस रुचि के हों उन्हें भी लाएंगे य़ह कामना है ।
0 हंस जी की पंक्तियां सचमुच काबिले तारीफ हैं ।
0 मधु जी की टिप्पणी देखी और उनकी यहां पारिवारिक उपलब्धि, नहीं... बल्कि बहुत खुशी की जानकारी पर मेरी भी ढेरो शुभकामनाएं और दिली बधाई ।
अब कुछ और...
कल की मीडिया पर शिवसैनिकों की हमले की घटना घोर निंदनीय है । लोकतंत्र में मीडिया की अपनी महत्ता होती है शायद वे भूल गए, और फिर विरोध के और भी तो तरीके हैं । मगर लगता है यह उनकी खिसियाहट ही है, खैर जो भी हो, उन्हें समय रहते अपने को बदलने की जरूरत है, अन्यथा अभी तो महाराष्ट्र की जनता ने उन्हें नकार दिया हे कल को पूरे देश की ही जनता उन्हें हाशिए पर डाल देगी, तब क्या करेंगे ।
प्रदीप शुक्ला
आपका दिल यहीं रहेगा...
आपकी यात्रा शुभ हो ।
बाल नहीं बबाल ठाकरे
Friday, November 20, 2009
भगवान आप भी नहीं हैं ठाकरे साहब (२१.११.२००९) सुबह १०.४५
लेकिन आप अपने को मुंबई का भगवान समझ बैठे हैं। जो भी आपके खिलाफ कुछ कहेगा, आपके शिव सैनिक उस पर चढ़ दौड़ेंगे। उसे सबक सिखायेंगे। मानो आपकी आलोचना करना संगीन जुर्म हो। वैसे आपको आलोचना सहन होती भी नहीं। तभी तो आपके आदेश पर आपके सैनिक मीडिया को लिखने की 'तमीज' सिखा कर आए। और तमीज सिखाने वालों का ख़ुद का आचरण तो देखिये। भई वाह।
उस पर तुर्रा ये कि ठाकरे साहब कहते हैं कि वो शिव सैनिकों के गुस्से का उफान भर था। बजाये शिव सैनिको को सीमा में रहने की हिदायत देने के, वो तो अपना मानों 'शक्ति प्रदर्शन' कर रहे हैं। कभी संस्कृति, कभी भाषा, कभी फश्नेबल कपड़ो के नाम पर शिव सैनिकों की गुंडागर्दी आख़िर कब तक चलेगी। ठाकरे साहब आपको उम्र हो गई पोलिटिक्स में। अब तो आपकी पार्टी भी दो-फाड़ हो गई , अब तो तानाशाही वाली हरकतें छोडिये। वक्त बदल गया गया हैं और लोगों की सोच भी बदल गई गई। अपनी पसंद -नापसंद , मर्ज़ी दूसरों पर थोपना बंद कीजिये। आप अपनी मर्ज़ी से दुनिया को नहीं चला सकते। दुनिया अपनी तरह से चलती है। कल को किसी ने आपको 'तुर्की-बतुर्की' यांनी आपकी भाषा में ही जवाब दे दिया तो क्या रह जाएगा आपका सम्मान।
इधर चीफ मिनिस्टर साहब फरमाते हैं किसी को बख्शा नहीं जाएगा। कोई अशोक जी से पूछे आज तक शिवसेना का किसी ने क्या उखाड़ लिया। और तो और , अब जबकि शिव सेना नेता संजय राउत ने हमले की जिम्मेदारी ली है और बाल ठाकरे ने भी हमले की हिमायत की है, तो क्या अशोक चव्हाण इन के खिलाफ कोई केस दर्ज कर सख्त कार्रवाई करेंगे या अपने पूर्ववर्ती मुख्य मंत्रियों की तरह 'नख-दन्त विहीन ' साबित होंगे।
इंदौर यात्रा
पालागन
आपकी इंदौर यात्रा मंगलमय हो। मकबूलजी आपको इतनी अच्छी गज़ल लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई।
पालागन, मकबूल जी।
हे शब्द मनीषी नीरवजी
तनिक मुझे सहार दो ।
हंस
हम तो चले इंदौर
बंधुओ पारिवारिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए मैं कल इंदौर और भोपाल जा रहा हूं,इस बीच आपके साथ नहीं रह पाउंगा मगर मेरा दिल आपके ही साथ रहेगा। मोर्र्चा संभाले रहें।
नीरव
जो बात तुझमें है वो तेरी तस्वीर ने कही
0 अनिलजी आपकी रचना और सुझाव दोनों दिलकश हैं। तामील होगी।
0 मकबूलजी खुर्शीद साहब की गजल बेहतरीन है। बधाई
पं. सुरेश नीरव
जय जवान-जय किसान
पेश है कुछ हट के ...
मिलते रहे सभी से, मगर अजनबी रहे
दुनिया न जीत पाओ तो, हारो न ख़ुद को तुम
थोड़ी बहुत ज़हन में, नाराज़गी रहे
अपनी तरह सभी को, किसी की तलाश थी
हम जिसके भी करीब रहे, दूर ही रहे
गुजरो जो बाग़ से, तो दुआ मांगते चलो
जिसमें खिले हैं फूल, वो डाली हरी रहे
Thursday, November 19, 2009
जब खुली आंखें तो इन आखों को रोना आ गया
मैं ने समझा वाकई मौसम सलोना आ गया।
डर रहा हूँ, बेनियाज़ी अब कहाँ ले जाएगी
चलते- फिरते भी मेरी आंखों को सोना आ गया।
एक चुल्लू आब लेकर, फिर रहा है इस तरह
जैसे गागर में उसे सागर समोना आ गया।
देख कर अंजाम फूलों का, मैं घबराया बहुत
खुशगुमानी थी, कि धागों में पिरोना आ गया।
क्यों शिकायत है, भला दरिया की बुसअत से हमें
चंद क़तरों ही से जब लब को भिगोना आ गया।
तख़्त पर बैठा हुआ, यों खेलता हूँ ताज से
जैसे इक बच्चे के हाथों में खिलौना आ गया।
कोई भी आलम लबे- दरिया अभी पहुंचा नहीं
नाखुदाओं को मगर कश्ती डुबोना आ गया।
आलम खुर्शीद
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
क्या करोगे तुम मेरी तस्वीर लेकर : राजमणि
बँटवारा कर दो ठाकुर।
तन मालिक का धन सरकारी
मेरे हिस्से परमेसुर।
शहर धुएँ के नाम चढ़ाओ
सड़कें दे दो
झंडों को
पर्वत कूटनीति को अर्पित
तीरथ दे दो
पंडों को।
खीर खांड ख़ैराती खाते
हमको गौमाता के खुर
सब छुट्टी के दिन साहब के
सब उपास
चपरासी के
उसमें पदक कुँअर जू के हैं
खून पसीने
घासी के
अजर अमर श्रीमान उठा लें
हमको छोड़े क्षण भंगुर
पंच बुला कर करो फ़ैसला
चौड़े चौक
उजाले में
त्याग तपस्या इस पाले में
राजभोग
उस पाले में
दीदे फाड़-फाड़ सब देखें
हम देखेंगे टुकुर-टुकुर
प्रस्तुति –राजमणि
बधाई, साधुवाद
प्रदीप जी ने तो ज्ञान का भंडार ही हमारे सामने खोल दिया है। इसके लिए वो निस्संदेह साधुवाद के पात्र हैं।
मकबूल जी द्वारा प्रस्तुत अदम गोंडवी की एक और रचना ' जिस्म क्या है......' आज के हालत पर सटीक बैठती है। मन को छू लेती है। माकूल जी इसी तरह बेहतरीन रचनाएँ देते रहें ।
आदरणीय नीरव जी से अनुरोध है वे किसी फिल्मी हस्ती की भी हजामत बनायें।
२० नवम्बर २००९
पंडित जी
देखकर अच्छा लगा।
आदरणीय नीरवजी,आपने आज जो हजामत में मुद्दे उठाए हैं उसकी मैं एक घरेलू महिला होने के नाते तारीफ करती हीं। आज बहुत दिनों बाद डॉ मधु चतुर्वेदी बलॉग पर अवतरित हुईं,देखकर अच्छा लगा। उन्हें दादी बनने के मौके पर हार्दिक बधाई। प्रदीप शुक्ला ने कंप्यूटर पर अच्छी जानकारी दी है।
मधु मिश्रा
सूचना जानकारी
पूर्व राष्ट्रपति ए.पी. जे. अब्दुल कलाम के अथक प्रयासों से प्रारम्भ की गई परियोजना Digital Library of India ( http://www.new.dli.ernet.in/ ) क मूर्त रूप आज भारतीय ऐतिहासिक पुस्तकों और पत्रिकाओं के एक ऐसे विशाल संग्रह का नाम बन चुका है, जिसमें आप एक बार जाने के पश्चात जाने कितने घंटे, दिन, माह और बरस बिताना पसंद करेंगे| यहाँ विभिन्न भाषाओं की दुर्लभ पुस्तकें और पत्रिकाएँ आपको मिल सकती हैं जो आप को किसी पुस्तकालय तक में धक्के खाने और भटकते खोजने पर भी संभवतः ना मिलें|
भाषा / वर्ष / विषय / अनुक्रम का चयन कर आप वहाँ डाऊनलोड के लिए उपलब्ध रीडर द्वारा इन पुस्तकों/ पत्रिकाओं को ऑनलाईन इनके मूल रूप में पढ़ सकते हैं|
लाखों पृष्ठों में समाहित यह एक ऐसा ऐतिहासिक संग्रह और कार्य है कि जाने आने वाली कितनी पीढियां इस से लाभान्वित और गौरवान्वित होंगी| पुनरपि अभी बहुत कार्य शेष है और निरंतर प्रगति पर है|
आप इस लिंक को अवश्य बुकमार्क कर लें व सहेज कर रख लें|
प्रदीप शुक्ला
रचनाकारों को मेरी ओर से बधाई...
आज बहुत दिनों बाद मैं लोक मंगल पर आ रही हूं इसके लिए पहले तो इस गुनाह के लिए माफी मांग लूं फिर कारण बता दूं.. बिना कारण के ब्लॉग से कोई क्यों गायब होगा और खासकर मेरे जैसी शख्सित, तो पहला कारण तो था मेरा स्वास्थ्य का खराब होना,मुझे वाइरल हो गया था। दूसरा कारण हुआ मेरा दादी बन जाना। आप सबकी दुआओं से मेरे पुत्र को एक पुत्र का पिता बनने कै मौका मिला है। इस नितांत व्यक्तिगत व्यस्तता में मैं इतनी व्यस्त रही कि ब्ल़ॉग को खोलकर देख भी नहीं पाई। आज जब ब्लॉग देखा तो बहुत सारे नए पुराने लोगों को देखने का मौका मिला।
0 अनिल गुप्ता जी का स्वागत है। बहुत अच्छा लिख रहे हैं।
इसके बाद राजमणिजी ने अदम गौंडवीजी रचना पढ़वाई,उसमें डूबकर जो आनंद आया है उसे मैं शब्दों में व्यक्त नहीं कर सकती।
0 मधु मिश्राजी भी इन दिनों लिख रहीं हैं, यह देखकर बेहद खुशी हुई।
0 प्रदीप कुमार शुक्ला ने पुस्तक समीक्षा का अच्छा कॉलम शुरू किया है। इसे आगे चलाते रहें इससे ब्लॉग की साहित्यिक महत्ता बढ़ेगी।
0 मकबूलजी ने तो एक-से-बढकर-एक गजलों का मुसलसल सिलसिला चला रखा है।लोग इसे बड़े चाव से पढते हैं।
0 पं. सुरेश नीरव का हजामत स्तंभ तो कहर ढा रहा है। अपनी कलम से कई बड़े सूरमाओं को खाक चटा दी है।
0 कर्नल विपिन चतुर्वेदीजी की ग्वालियर पर लिखी कविता मन को छू गई।
0 मुनीन्द्र नाथ जी ने पुलसिया मुद्दों को खूब ढंग से उछाला है।
0 भगवान सिंह हंस की कविता बहुच सार्थक कविता लगी।
सभी रचनाकारों को मेरी ओर से बधाई...
डॉ. मधु चतुर्वेदी
Wednesday, November 18, 2009
ग़ज़ल
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिए।
जो बदल सकती है इस दुनिया के मौसम का मिज़ाज
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिए।
जल रहा है देश, ये बहला रही है कौम को
किस तरह अश्लील है इन की भाषा देखिए।
मत्श्य्गंधा फिर कोई होगी किसी ऋषि का शिकार
दूर तक फैला हुआ गहरा कुहासा देखिए।
अदम गौंडवी
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मकबूल
यानि सरकार न हुई, किरयाना की दुकान हो गई।
मुझे याद आता है टीवी पर शीलाजी और बीजेपी की सुषमा स्वराज का आमने सामने साक्षात्कार । उन दिनों सुषमा जी दिल्ली की मुख्य मंत्री थीं । सुषमा जी बता रही थीं कि वो कैसे आधी -आधी रात को दिल्ली के थानों का औचक दौरा कर के दिल्ली की कानून - व्यवस्था को दुरुस्त करने का प्रयास कर रही थीं। तब शीला जी ने कहा था कि सरकार ऐसे नही चलती। आपको पुलिस के आला अफसरों को बुला कर उनसे रिपोर्ट ले कर उन्हें निर्देश देने चाहियें, उन पर नज़र रखनी चाहिए, न कि ख़ुद जगह -जगह भागना चाहिए। तो शीला जी, आपको करना तो ये चाहिए कि आप जमाखोरी पर लगाम लगायें। जमाखोरों के खिलाफ सख्त एक्शन लें। ताकि गोदामों में जमा माल बाज़ार में आए और कीमतें नीचे गिरें। लेकिन यहाँ तो आप ख़ुद ही सामान बेचने चल दी । महंगाई रोकने का या कम करने का ये उपाए है क्या। आप के सरकार चलाने के हुनर को क्या हुआ। मुनाफाखोरों से कोई सेटिंग हो तो दूसरी बात है।
बहरहाल, जल्दी कुछ कीजिये, वरना लोग महंगाई से आजिज आ कर हवा खाना और पानी पीना शुरू कर देंगे
१९नवम्बर २००९
उस्तरा
आपके उस्तरे का कमाल है जो निरंतर रूप से हजामत बना रहा है बिना भेद के। उस्तरा जो लगबाके लाये हैं पथिक जी , हंस ने संभाला है, मकबूल जी ने पत्थर पर घिसा है और पूनम जी ने पत्थर पर छींटे मारे हैं ।
वाह उस्तरा १
पालागन ।
आज की खबरहमारे दिलों को वही अच्छे लगते
आपकी ये पंक्तियां झकझोरवेवाली हैं- वक्त आ गया है कि राष्ट्रवादी तत्वों को जाग जाना चाहिये. विशेषकर महाराष्ट्रियन राष्ट्रवादियों को. अब चुप बैठने का वक़्त नहीं है. उठो और बता दो कि हम शहर ,प्रांत/प्रदेश ,भाषा से ऊपर हैं .देश पहले है.
काश हमारे नेता कुछ प्रेरणा लें।
0 भगवान सिंह हंसजी
आप की कविता की ये पंक्तियां-
खरोंके पर ही
सोना पड़ेगा सबको
क्योंकि स्वार्थ की चादर
बिछी है हर तरफ
अत्छी लगीं। बधाई...
0
अनिल गुप्ताजी,
आपने नीरवजी के संदर्भ में जो लिखा है, वह सार्वजनिक सत्य है-आपका ग्वालियर प्रवास संस्मरण सचमुच मन में एक आशा जगाता है कि लिखते रहो, समय के साथ आपके हस्ताक्षर स्वयमेव इतिहास के पन्नो पर दर्ज हो जायेंगे। कल्पना ही की जा सकती है आपके ज़ज्बात की, जिस शहर ने बोया था बीज कभी, वही आज दरखत बना शहर में झूम रहा है। वाकई ऐसा सौभाग्य हर किसी को नहीं मिलता। मेरी हार्दिक बधाई।
आपकी इन पंक्तियों के लिए मेरी बधाई..
0 मकबूलजी, आपके ये सेर बेहतरीन लगे-
हमारे दिलों को वही अच्छे लगते
कि जिन के दिलों में मुहब्बत बसी है।
मोहब्बत का दुश्मन ज़माना है लेकिन
सभी के दिलों में ये फूली फली है।
मुनीन्द्रजी ने भी बढिया तबसिरा किया है। खासकर पुलिस के कामकाजी ढंग पर,बधाई...
आप लोग यूं ही लिखते रहें मेरी शुभकामनाएं
मधु मिश्रा
Tuesday, November 17, 2009
कौन किसकी कर रहा है
सुंदर रचनाओं के लिए साधुवाद
अगर्चे मोहब्बत जो धोखा रही है
तो क्यों शम्मा इस की हमेशा जली है।
हमारे दिलों को वही अच्छे लगते
कि जिन के दिलों में मुहब्बत बसी है।
मोहब्बत का दुश्मन ज़माना है लेकिन
सभी के दिलों में ये फूली फली है।
बिठाते थे सब को ज़मीं पर जो ज़ालिम
वो हस्ती भी देखो ज़मीं में दबी है।
सभी कीमतें आसमां चढ़ रहीं जब
तो इंसां की क़ीमत ज़मीं पर गिरी है।
हो सच्ची लगन और इरादे जवां हों
तो मंज़िल हमेशा क़दम पर झुकी है।
ज़माने की चाहा था सूरत बदलना
मगर अपनी सूरत बदलनी पड़ी है।
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
बदलता मंज़र
शहर में गाँव है
तपती रेत में अब
सबका पाँव है
सबको चकोटती
मत -मत की बात फिर
मयसर न होगी
सुनहरी रात फिर
खरोंके पर ही
सोना पड़ेगा सबको
क्योंकि स्वार्थ की चादर
बिछी है हर तरफ
बदल गयी है भंगिमा
आज इन्सान की
बिक गयी है जमीर
मेरे गाँव की
जय बोलो बेईमान की
ये अन्धेरा अब पिघलना चाहिये
सूर्य बादल से निकलना चाहिये
कब तलक पर्हेज़ होगा शोर से
अब हमारे होंठ हिलना चाहिये
आजकल समाचार पढ़ना या सुनना बोझीला सा लगने लगा है. समाचार जानकारी कम देते हैं,विचलित अधिक करते है . यह सिलसिला काफी लम्बे अर्से से ज़ारी है. राजनीतिक समाचार इतना क्षोभ भर देते हैं कि उससे बाहर आना मुश्किल हो जाता है. राज ठाकरे ,मनसे, शिवसेना आदि का अर्थ ज़हर बुझी खबर हो गया है.
सचिन तेन्दुलकर के क्रिकेट जीवन के दो दशक पूरे करने पर मीडिया की चर्चा अभी खत्म भी नहीं हुई थी कि बाला साहेब अपने आप को 'सुपर मराठा' साबित करने के चक्कर में राज ठाकरे से भी आगे निकल गये. बेचारे सचिन तो बस अपने सीधे-साधे उद्गार व्यक्त किये थे कि वह भारतीय पहले हैं और महाराष्ट्रियन बाद में. और बस तैश में आ गये बाला साहेब ठाकरे.
क्या एक् महाराष्ट्रियन भारतीय नहीं कहलायेगा? पहले देश है या प्रदेश ? किस सीमा तक जायेंगे ये छिछोरे राजनीतिक नौटंकीबाज़?
वक़्त आ गया है कि राष्ट्रवादी तत्वों को जाग जाना चाहिये. विशेषकर महाराष्ट्रियन राष्ट्रवादियों को. अब चुप बैठने का वक़्त नहीं है. उठो और बता दो कि हम शहर ,प्रांत/प्रदेश ,भाषा से ऊपर हैं .देश पहले है.
मानूस कुछ ज़रूर है इस जलतरंग में
इक लहर झमकती है मेरे अंग अंग में।
ख़ामोश बह रहा था ये दरिया अभी अभी
देखा मुझे तो आ गईं मौजें तरंग में।
संस्मरण सचमुच मन में एक आशा जगाता है...
बहुत दिन हो गए मधु जी दिखाई नहीं दे रहीं। भाई मकबूल जी दिल को छू लेने वाली गज़लें कहाँ से लिखते हैं। राजमणि जी की प्रस्तुति लाज़वाब रही। प्रदीप शुक्ला जी किताबों की समीक्षा करने में सिद्धहस्त हो चुके हैं। उनसे कुछ और की भी अपेक्षा है। आशा है निराश नहीं करेंगे।
सुभान अल्लाह..मरहबां..मरहबां..
आपने अदमगौंडवी साहब की बहुत धांसू रचना प्रस्तुत की है। इसकी जितनी तारीफ की जाए कम है।
0 जनाब मकबूलजी,
आलम खुर्शीद की ग़जल सुभान अल्लाह..मरहबां..मरहबां..
0 अनिलजी,
बाला साहेब ठाकरे पर बड़ी बेहतरीन टिप्पणी की है आपने। आज मैंने भी उनकी हजामत बनाई है। देखी होगी।
समाज को जगाते रहें।
पं. सुरेश नीरव
बुलंद हौसला चाहिए,
अदम गोंडवी की कविता
आज कविता को उस संधर्भ को याद करके लगता है कि कुछ भी नन्ही बदला है , केवल bअदला है तो प्रचार प्रसार के माध्यम और वह भी केवल उच्चा पदस्थ लोगों के लिए है। देश में दरिद्र अभी भी है । पुलिस कि बर्बरता अभी भी बरक़रार है । अब गुंडों को कोई गुंडा कहने कि हिम्मत भी नन्ही दिखा सकता क्योनिक उसकी जान पहिचान पुलिस तथा नेता दोनों से है और दोनों को उसकी जरुरत है। कल बताया गया माननीय मुख्यमंती देहली ने जब जबाब तलब किया लगातार चोरी होने वाले क्षेत्र के पुलिस अधिकारीयों को तो दुसरे दिन ही चोर पकड़ में आ गए ॥
खेर जितना बच सको बचो बचो पुलिस से और उनके किसी लफड़े से ।
मुनीन्द्र नाथ
मानूस कुछ ज़रूर है इस जलतरंग में
इक लहर झमकती है मेरे अंग अंग में।
ख़ामोश बह रहा था ये दरिया अभी अभी
देखा मुझे तो आ गईं मौजें तरंग में।
वुसअत में आसमान भी लगता था कम मुझे
पर ज़िंदगी गुज़र गई इक शहरे- तंग में।
किरदार मेरा क्या है, यही सोचता हूँ मैं
मर्ज़ी नहीं है, फिर भी शामिल हूँ जंग में।
शीशा- मिज़ाज हूँ मैं, मगर ये भी खूब है
अपना सुराग ढूंढता रहता हूँ संग में।
इक दूसरे से टूट के मिलते तो हैं मगर
मसरूफ सारे लोग हैं, इक सर्द जंग में।
क्या फ़र्क है, ये अहले-नज़र ही बताएंगे
कुछ फ़र्क तो ज़रूर है, फूलों के रंग में।
आलम खुर्शीद
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
Monday, November 16, 2009
-अनिल की राग ठाकरे पर टिप्पणी अच्छी बन पड़ी, उन्हें भी बधाई । इसी तरह लगे रहो भाई ।
प्रदीप शुक्ला
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी कि कुएँ में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूँ सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़ि़या है घात में
होनी से बेख़बर कृष्ना बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले, फिर ढीली पड़ी, फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्ना थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पाँव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुँह काला करें
बोला कृष्ना से- बहन, सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई! क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्ना है चमारों के यहां
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहां
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है, मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बाहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रही
जानते हैं आप मंगल एक ही मक्कार है
हरखू उसकी शह पे थाने जाने को तैयार है
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गाँव की गलियों में क्या इज्जत रहेगी आपकी´
बात का लहजा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूँछों पर गए माहौल भी सन्ना गया
क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंज़ूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहाँ का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने –
`जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने´
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर `माल वो चोरी का तूने क्या किया´
`कैसी चोरी माल कैसा´ उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस, होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार क
`मेरा मुँह क्या देखते हो! इसके मुँह में थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूँक दो´
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहाँ चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुँहा बच्चा व बुड्ढा जो वहाँ खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे
´´ कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएँ नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूँ कोई कहीं जाए नहीं ´
´
यह दरोगा जी थे मुँह से शब्द झरते फूल से
आ रहे थे ठेलते लोगों को अपने रूल से
फिर दहाड़े "इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा"
इक सिपाही ने कहा "साइकिल किधर को मोड़ दें
होश में आया नहीं मंगल कहो तो छोड़ दें"
बोला थानेदार "मुर्गे की तरह मत बांग दो
होश में आया नहीं तो लाठियों पर टांग लो
ये समझते हैं कि ठाकुर से उनझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है जेल है"
पूछते रहते हैं मुझसे लोग अकसर यह सवाल
`कैसा है कहिए न सरजू पार की कृष्ना का हाल´
उनकी उत्सुकता को शहरी नग्नता के ज्वार को
सड़ रहे जनतंत्र के मक्कार पैरोकार को
धर्म संस्कृति और नैतिकता के ठेकेदार को
प्रांत के मंत्रीगणों को केंद्र की सरकार को
मैं निमंत्रण दे रहा हूँ आएँ मेरे गाँव में
तट पे नदियों के घनी अमराइयों की छाँव में
गाँव जिसमें आज पांचाली उघाड़ी जा रही
या अहिंसा की जहाँ पर नथ उतारी जा रही
हैं तरसते कितने ही मंगल लंगोटी के लिए
बेचती है जिस्म कितनी कृष्ना रोटी के लिए
-अदम गोन्ड्वी
यह गौरव की बात है।
प्रदीप शुक्ला और राजमणिजी की मेहनत को सलाम। और मकबूलजी की तो बात ही न्यारी है। क्या कहूं। शब्द नहीं हैं मेरे पास। मुनीन्द्रजी के कागजों के ढेर में हसीनाओं के चंद खतूत भी बरामद नहीं हुए,यह उनके उजले और साफ-शफ्फाफ चरित्र को दर्शाता है हां अगर वो कवि होते तो ढेर ही प्रेमचिट्ठियों का होता। उनके विदेश यात्रा के संस्मरण लाजवाब रहे। बधाई
भगवान सिंह हंस
स्रोता पढ़े-लिखे थे,संजीदा थे और रसवंत भी थे।
ग्वालियर-14 नवंबर, प्रभात चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा एशिया के सुप्रसिद्ध नेत्र चिकित्सक डॉ. भारतेन्दु शुक्ल की चौथी काव्यकृति व्यथा की कथा का लोकार्पण रतन ज्योति नेत्र चिकित्सालय के सभागार में आयोजित किया गया। यह चिकित्सालय खेड़ापति रोड पर स्थित है और इस समय मध्य प्रदेश के अव्वल नेत्र अस्पतालों में एक है। शहर के सङी नामचीन साहित्यकार एवं राजनेता इस अवसर पर मौजूद थे और मेरे लिए सबसे ज्यादा गौरव की बात यह थी कि जिस शहर मुझे कङी बीज रूप में देखा था वही शहर आद मुझे एक तरुवर के रूप में मान्यता दे रहा था। वयोव्रद्ध साहित्यार की इस कृति का मेरे हाथों लोकार्पण मेरे लिए हर्ष का ही विषय है ऐसा नहीं कि इससे पहले मैंने ग्वालियर में किसी और लेखक की पुस्तक का लोकार्पण नहीं किया हो मगर इस बार के कार्यक्रम का वर्ग चरित्र कुछ और ही था। सारे स्रोता पढ़े-लिखे थे,संजीदा थे और रसवंत भी थे।
कार्यक्रम का शुभारंभ कविवर पं. प्रकाश मिश्र के उदबोधन से हुआ। पं. सुरेश नीरव को इसके बाद बोलने का मौका मिला। इसके बाद डॉ. पुनम चंद तिवारी और सत्यकाम विद्यालंकार ने आलेख पढ़े। अंत में कवि ने अपने सध्यः प्रकाशित संग्रह से खुछ कविताएं भी पढ़ीं। संचालन बड़ी कुशलता के साथ कादंबरी आर्य ने किया। स्वादिष्ट स्वल्पाहार के बाद कार्यक्रम का समापन हुआ।
हजामत इनकी बनाएगा,तभी मजा कुछ आएगा..
यूँ तो हर पाँव
अपने निशान छोड़ता है
पर, हर निशान
स्थाई और अनुकरणीय नहीं होता
क्या कभी तुमने मुड़कर देखा है
कि तुमने
अपने पाँवों के निशाँ
कहाँ छोड़े थे-
मिट्टी के ढेर या
रेत की कगार में?
यदि थे रेत पर
तो हवा ने मिटा दिए होंगे
यदि थे मिट्टी पर
तो बौछार से धुल गए होंगे।
भाई अनिल गुप्ता ने राग मराठी के जरिए राज ठाकरे की खासी खबर ली है। और उनकी टुच्ची राजनीति को बेनकाब किया है। प्रदीप शुक्लजी ने जो न्योता दिया है उस पर विचार किया जाना चाहिए। और नीरवजी तो जबरदस्त हज्जाम हो ही गए हैं ये बात अलग है कि उन्हें खुद अपने बाल कटवाने की फुर्सत नहीं है। कभी न कभी, कहीं न कहीं, कोई न कोई, हजामत इनकी बनाएगा,तभी मजा कुछ आएगा..
ब्लॉग पर लिखन्वाले बढ़ रहे हैं यह शुभ संकेत है।
जय लोक मंगल
मधु मिश्रा
ग्वालियर को ले कर आपकी लिखी ये पंक्तियां अमर हैं। मैं गली बार ग्वालियर आप के साथ ही जाऊंगा। बहरहाल आपका अपने शहर के प्रति लगाव काबिले तारीफ है।
अरम्य ग्वालियर देश हमें तू प्राणों से भी प्यारा है
जीवन की आकुल घरीओं का तू ही बस एक सहारा है ।
हम देश विदेश कहीं भी हों होगा पर तेरा ध्यान सदा।
तेरा ही पुत्र कहाने में होगा हमको अभिमान सदा।
मकबूलजी
अंसार कंबरी के दोहे बहुत सहज और सरल शैली में अपना पूरा प्रभाव छोड़ते हैं। खासकर ये बाले-
हर कोई हमको मिला, पहने हुए नक़ाब
किसको अब अच्छा कहें, किसको कहें ख़राब।
सुख-सुविधा के कर लिए, जमा सभी सामान
कौड़ी पास न प्रेम की, बनते हैं धनवान।
मुनीन्द्र ऩाथ चतुर्वेदी जी,
काग़ज़ के इक ढेर में ढूंढ रहे क्या यार
लव लैटर कैसे मिले किया नहीं जो प्यार
नंबर चोखे पाय के अफसर बन गए आप
नहीं दिया करने कभी मुनि नाम ने पाप
पूरे जीवन में रहें आप सदा ही टॉप
प्रदीप शुक्लजी,
आपकी पुस्तक समीच्छा और आमंत्रण दोनों ही लाजवाब हैं। बधाई।
राजमणिजी,
बहुत दिनों बाद आपके प्रकट होने की बधाई। साथ ही रचनात्मक सहयोग के लिए भी शुक्रिया..
जय लोक मंगल
पं. सुरेश नीरव
कब तक एक ही दातुन कीजियेगा बाबा साहेब
Sunday, November 15, 2009
कई हफ्तों बाद लोक मंगल पर
यूँ तो हर पाँव
अपने निशान छोड़ता है
पर, हर निशान
स्थाई और अनुकरणीय नहीं होता
क्या कभी तुमने मुड़कर देखा है
कि तुमने
अपने पाँवों के निशाँ
कहाँ छोड़े थे-
मिट्टी के ढेर या
रेत की कगार में?
यदि थे रेत पर
तो हवा ने मिटा दिए होंगे
यदि थे मिट्टी पर
तो बौछार से धुल गए होंगे।
वह देखो मेरे पैरों के निशान
सदियों बाद आज भी चट्टानों पर अंकित हैं
ऐसे निशाँ मात्र चलने से नहीं
चलने की शैली से बनते हैं
और जिस दिन
तुम्हें चलने की शैली आ जाएगी
मेरे दोस्त!
तुम मुझसे ईर्ष्या नहीं करोगे।
प्रस्तुति –राजमणि
राज का राग 'मराठी'
अब कुछ सीधी बातें, राज साहेब बीमार होने पर क्या महाराष्ट्रियन डॉक्टर से ही इलाज कराएँगे। क्या महाराष्ट्र में मराठियों द्वारा बना कपड़ा ही पहनेगे, बच्चों को मराठी स्कूल में ही भेजेंगे, मराठी किसानो का पैदा किया अनाज ही खायेगे। मराठी फिल्म्स ही देखेंगे, मराठी बैंक में ही खाता खोलेंगे, हमेशा मराठी वस्त्र ही धारण करेंगे, हमेशा मराठी बोलेंगे, खैर छोडिये, सिर्फ़ इतना बता दीजिये, आज तक आपने देश की तो छोडिये, आम मराठी का क्या भला किया है।
प्रणाम आप बड़े महान हैं।
ग्वालियर गौरव
जिसकी गोदी में बैठ कभी हमने सुखगाने गाये थे ।
पाकर संताप कभी इसकी गोदी में अश्रु बहाए थे ।
पिछले साल एक समारोह में जाने का अवसर मिला था। उसके बहुत पाहिले ग्वालियर के मेले के कविसम्मेलन में उस काल की शिवमंगल सिंह सुमन जैसी हस्तियों के साथ मंच के कोने पर भी स्थान मिला है। मेडिकल कॉलेज हिन्दी परिषद् के मंच को बच्चन,रामकुमार वर्मा और सोहनलाल द्विवेदी जैसे महापुरुषों ने मेरे कार्यकाल में गौरवान्वित किया है। उस ग्वालियर की चर्चा होने पर रोमांच होना स्वाभाविक है।
अ रम्य ग्वालियर देश हमें तू प्राणों से भी प्यारा है
जीवन की आकुल घरीओं का तू ही बस एक सहारा है ।
हम देश विदेश कहीं भी हों होगा पर तेरा ध्यान सदा।
तेरा ही पुत्र कहाने में होगा हमको अभिमान सदा।
तो सुरेशजी , अगली बार समय से सूचित करिएगा। उम्मीद यह है की इस महीने के अंत में दिल्ली प्रवास का अवसर आयेगा, तब दर्शन करूंगा।
विपिन चतुर्वेदी
Saturday, November 14, 2009
सूचना व आमंत्रण

दसवाँ राष्ट्रीय समता लेखक सम्मलेन
विषय: बहु ध्रुवीय दुनिया - सुरक्षित दुनिया
आयोजक - महावीर समता संदेश (पाक्षिक) उदयपुर
तिथि 29, 30, 31 जनवरी 2010, स्थान - उदयपुर
email : samtasandesh@yahoo.co.in
विषय: ‘‘बहुध्रुवीय दुनिया-सुरक्षित दुनिया’’ विषय पर तीन दिवसीय लेखक सम्मेलन के आयोजन में सहयोग हेतु।
मान्यवर,
महावीर समता संदेश ‘‘पाक्षिक’’ गत 18 वर्षों से उदयपुर से प्रकाशित हो रहा है। प्रकाशन के साथ-साथ यह सामाजिक चेतना के लिए अनेक आयोजन भी करता रहा है। इन आयोजनों में लेखक सम्मेलनों का अपना महत्वपूर्ण स्थान है।
वर्ष 2010 की 29, 30 व 31 जनवरी को दसवाँ लेखक सम्मेलन का आयोजन प्रस्तावित है। इस बार का लेखक सम्मेलन में विषय ‘‘बहुध्रुवीय दुनिया : सुरक्षित दुनिया’’ रखा गया है। चूँकि विषय बहुत जटिल है, इस पर ठोस विचार विमर्श हो पाये इसके लिए इसे विभिन्न सत्रों में बाँटने का प्रयास किया है।
प्रस्तावित सत्र
उद्घाटन सत्र - बहुध्रुवीय दुनिया- सुरक्षित दुनिया,
दूसरा सत्र - निगुर्ट देश व संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका में बदलाव की आवश्यकता
तीसरा सत्र - मीडिया, साहित्य कविता और विश्व शान्ति
कवि गोष्ठी
30 जनवरी (महात्मा गाँधी निधन दिवस)
प्रथम सत्र - हिन्द स्वराज और विश्व शान्ति,
दूसरा सत्र - अहिंसा, निशस्त्रीकरण और विश्व शान्ति,
तीसरा सत्र - गाँधी : विचार और मानवता की रक्षा
31 जनवरी, गाँव झाड़ोल - ग्राम विकास और विश्व पर्यावरण - समापन
तीन दिवसीय इस राष्ट्रीय समता लेखक सम्मेलन में देश भर से लेखक, पत्रकार, साहित्यकार, कवि, प्राध्यापक, समाजकर्मी, महिलाऐं एवं छात्र-छात्राऐं भाग लेंगे। इस आयोजन में पूर्व सांसद एवं साहित्यकार रत्नाकर पाण्डे, बनारस, रघु ठाकुर नई दिल्ली, पत्रकार अनिल चमेड़िया, डॉ. राम शरण जोशी तथा पत्रकार एवं समाजकर्मी सुरेश पण्डित सा. अलवर, समाजवादी चिन्तक सुरेन्द्र मोहन दिल्ली, मंजू मोहन, गिरिराज किशोर कानपुर, प्रो. बृजेश लखनऊ व वेद व्यास, जैसे समाजकर्मियों व चिन्तकों के भी इस सम्मेलन में भाग लेने की सम्भावना है।
आशा ही नहीं, पूरा विश्वास है कि आप हमारे प्रस्ताव पर विचार कर सकारात्मक उत्तर देंगे।
डॉ. हेमेन्द्र चण्डालिया, हिम्मत सेठ
सम्पादक, प्रधान सम्पादक
आधार पत्र
विश्व को उम्मीद थी कि साम्यवादी सोवियत संघ के पतन, शीत युद्ध की समाप्ति और एकल ध्रुवीय शक्ति व्यवस्था के उदय के साथ राष्ट्रों के बीच तनाव भी खत्म होंगे और मानवता स्थायी शांति के युग में प्रवेश करेगी। लेकिन विगत दो दशकों (1989-2009) की अनुभव गाथा राष्ट्रों के बीच तनावों, हिंसात्मक संघर्षों, क्षेत्रीय युद्धों और कमजोर देशों पर आक्रमणों और धार्मिक आतंकवाद की त्रासदियों का इतिहास है। 1997 में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिटन ने स्वयं संयुक्त राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए इस सच्चाई को औपचारिक रूप से स्वीकार किया था कि शीत युद्ध (कोल्ड वार) की समाप्ति के बावजूद विश्व में हिंसक संघर्षों की तादाद बढी है। शांति लौटी नहीं, अंशाति बढ़ी है। आखिर क्यों?
इस सवाल का जवाब सीधा व साफ है। आज विश्व में एक ही शक्ति है अमेरिका। दूसरी महाशक्ति के रूप में रूस के विलुप्त होने के पश्चात विश्व मानवता ने सुख शांति की आशाएँ अमेरिका से बाँधी थीं। हम सभी को विश्वास था कि पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में लम्बे समय से चले आ रहे हिंसात्मक विवादों का अन्त हो जाएगा। परमाणु शस्त्रों की होड़ नहीं लगेगी, निःशस्त्रीकरण की प्रक्रिया तेज होगी, और गरीबी अशिक्षा एवं भुखमरी के विरूद्ध विकसित व विकासशील देशों का साझा युद्ध तीव्रतर होता रहेगा। राष्ट्रों और समाजों के बीच समतावाद परिवेश को विकसित किया जाएगा। लेकिन क्या ऐसा हुआ?
बहु प्रचारित वैश्वीकरण के बावजूद स्थिति में रैडीकल सुधार नहीं हुआ है। विश्व बैक ने स्वयं अपनी वार्षिक रिपोर्टों में यह सच्चाई स्वीकारी है कि वैश्वीकरण के दौर में विषमता बढ़ी है। आज एक अरब से अधिक लोग भुखमरी की कगार पर जिंदा है। क्या अमेरिकी नेतृत्व में उभरी एकल ध्रुवीय व्यवस्था मानवता को इन त्रासदियों से त्राण दिला सकी?
हम क्यों भूल जाते है कि एकल ध्रुवीय दौर में ही दो दो खाड़ी युद्ध हुए | अफगानिस्तान अशांति में झुलस रहा है। कारगिल युद्ध हुआ, फिलिस्तनी व इजराइल के बीच झडपें जारी हैं। भारत पाक चीन की सीमाएँ सुलगी हुई हैं। क्यों नहीं यह व्यवस्था इन समस्याओं का हल निकाल सकी है।
जाहिर है, आज विश्व अमेरिकी वर्चस्ववाद की कृपा दृष्टि पर आश्रित है क्योंकि तमाम आर्थिक संगठन, सामरिक संगठन, इस देश के बंधक बने हुए है। जब वारसा संधि समाप्त हो चुकी है तो नाटों को जिंदा रखा जा रहा है। जब अमेरिका का एकमात्र दुश्मन साम्यवादी सोवियत संघ हमेशा के लिए परास्त हो चुका है। तब नाटों जैसे सैनिक संगठन को किस लिए सक्रिय रखा गया है। आज नाटों की सेवाएँ अफगानिस्तान में कहर बरफा रही है। अमरिका ने विश्व के विभिन्न कोनों में अपनी सैनिक छावनियाँ कायम रखी हुई है। आखिर क्यों?
सिर्फ इसलिए कि एकल ध्रुवीय व्यवस्था के माध्यम से वैश्विक पूंजीवाद को उसकी मंजिल तक सुरक्षित पहुँचाया जा सके। यह स्थिति नव साम्राज्यवाद व नव उपनिवेशवाद की सूचक है। इसका प्रतिरोध किया जाना चाहिए और अन्य विकल्पों के संबंध में भी सोचने की जरूरत है।
क्या यह आवश्यक नहीं है कि एकल ध्रुवीय व्यवस्था के समानान्तर बहुध्रुवीय व्यवस्था के निर्माण के लिए आवाजें बुलंद की जाएँ , लोगों को बतलाया जाए कि जब विश्व में शक्ति संतुलन नहीं होगा तब तक स्थायी या दीर्घजीवी शांति की कल्पना नहीं की जा सकती। जब बहुध्रुवीय व्यवस्था स्थापित होगी तो संयुक्त राष्ट्र संघ का भी लोकतान्त्रिकरण होगा। आज सुरक्षा परिषद और अन्य संस्थाओं में अमेरिकी शिविर का ही वर्चस्व है। अतः यह और भी अपरिहार्य है कि विश्व को तीसरे युद्ध से बचाने के लिए प्रतिरोधक शक्ति ध्रुव पैदा हों।
इसके साथ ही गुट निरपेक्ष आन्दोलन को भी शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता है। इसे अमेरिका के प्रभाव से मुक्त कराया जाना चाहिये। इसे पाँचवें, छठे, सातवें दशकों के समान सक्रिय बनाया जाना चाहिये। इस मंच का प्रयोग अमेरिकी वर्चस्ववाद के विरूद्ध जागरूकता उत्पन्न करने के लिए होना चाहिए।
अतः इस पृष्ठभूमि को ध्यान में रख कर इस तीन दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इसमें वे सभी साथीगण आमंत्रित है जो विश्व शान्ति व मानव कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध है और हर प्रकार के वर्चस्ववाद सैन्यवाद और कट्टरतावाद के विरूद्ध खड़े है।
संगोष्ठी का समापन पिछले वर्ष की भांति इस वर्ष भी उदयपुर से 50 किलोमीटर दूर तहसील झाड़ोल में रखा गया है।
प्रस्तुति-प्रदीप शुक्ला
EMAIL-pradeepshuklamv@gmail.com
Friday, November 13, 2009
अंसार कंबरी के कुछ दोहे
किसको अब अच्छा कहें, किसको कहें ख़राब।
सुख-सुविधा के कर लिए, जमा सभी सामान
कौड़ी पास न प्रेम की, बनते हैं धनवान।
चाहे मालामाल हों, चाहे हों कंगाल
हर कोई कहता मिला, दुनिया है जंजाल।
राजनीति का व्याकरण, कुर्सी वाला पाठ
पढ़ा रहे हैं सब हमें, सोलह दूनी आठ।
मन से जो भी भेंट दे,उसको करो कबूल
काँटा मिले बबूल का, या गूलर के फूल।
प्रस्तुति- मृगेन्द्र मक़बूल
पुराने कागजों की तलाश मैं
मुनीन्द्र नाथ
शुकामनाएं
नीरव जी आपकी ग्वालियर यात्रा के लिए शुभकामनाएं ।
आज की किताब
जिंदानी (कहानी संग्रह)
लेखिका-सरोज वशिष्ठ
प्रकाशक-वाणी प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य-125 रुपये
इस संगर्ह में उनकी कई छोटी संस्मरणात्मक शैली में लिखी गई कहानियां हैं । कहानियां पठनीय हैं । मानवीय मूल्यों पर धारित संग्रह की कहनियां संबंधों, प्रकृति तथा अन्य विषयों को लेकर चली हैं ।
दूसरी किताब है मीडिया पर,
मीडिया पर कुछ लिखे जाने की दिशा में, न केवल दिशा, बल्कि मीडिया की आज की काम काज की शेली, उसकी दशा को रेखांकित करती हुई एक किताब छपी है । इस किताब में माडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया, प्रिंट मीडिया, दोनों की गिरती दशा को इंगित करने का प्रयास किया है । उन मुद्दों, समस्याओं, जिन पर कि वास्तव में मीडिया को ध्यान देना चाहिए और समाधान तलाशने की कोशिश होनी चाहिए, वह नहीं हो रही, जो कि आज की जरूरत है, पर भी ध्यान दिलवाने की एक कोशिश इस किताब का विषय है ।
किताब- मीडिया का यथारथ्
लेखक-डॉ.रतन कुमार पांडेय
प्रकाशक-वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली मूल्य-125 रुपये ।
प्रदीप शुक्ला
आपके साथ ग्वालियर चलना चाहता था
क्या दोस्तों के हाथ में पत्थर नहीं कोई।
किस्मत सभी की वक़्त के हाथों में रहती है
इस दौर में किसी का मुक़द्दर नहीं कोई।
मकबूलजी साग़र निज़ामी की गजल के लिए बधाई।
नीरवजी आपने हजामत में मधु कोड़ा की अच्छी हजामत बनाई है मगर हमारे देश में हर पार्टी के अपने-अपने मधु कोड़ा हैं जिनकी फितरत बस देश को चरना है। इन पर नकेल अदालत और नीडिया ही कस सकता है। आप यह काम कर रहे हैं मेरी बधाई। मैं आपके साथ ग्वालियर चलना चाहता था मगर सर्दी-जुकाम नेम जकड़ के पकड़ लिया है इस लिए चाहकर भी नहीं चल पा रहा हूं मगर मेरी शुभ कामनाएं आपके साथ हैं।
भगवान सिंह हंस
























